मंगलवार, 19 मई 2009

पर्स में किसकी तस्वीर रखें

कल मैंने एक कहानी पढ़ी। अच्छी लगी इसलिए ब्लाग पर डाल रहा हूं। शायद आप को भी जंचे। कहानी यह है कि एक ट्रेन में एक टीटी को पर्स पड़ा मिला। उसने घोषणा की कि अगर किसी का पर्स खोया हो तो बताए। एक साठ साल का आदमी आया और उस पर्स को अपना बताने लगा। टीटी के निशानी पूछने पर उस बूढे़ आदमी ने कहा कि उसमें भगवान कृष्ण की फोटो है। बात सही थी, लेकिन यह कोई ठोस प्रमाण नहीं है, टीटी ने कहा। सुनकर बूढ़ा थोड़ा हंसा और कहने लगा, मैं तुम्हें इस तस्वीर के पीछे की कहानी बताता हूं।

मेरे पिता सरकारी अधिकारी थे। जब उन्होंने मुझे जेबखर्च देना शुरू किया तब मुझे यह पर्स दिया था। तब मैंने इस पर्स में अपने माता-पिता की तस्वीर लगाई थी। जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो उसमें मैने अपनी तस्वीर लगा ली। कुछ साल बाद मेरी शादी हुई। मेरी पत्नी बहुत सुंदर थी और जल्द ही मेरे पर्स में मेरी जगह मेरी पत्नी की तस्वीर लग गई।

कुछ समय बाद मेरे बेटा हुआ और पर्स की तस्वीर फिर बदल गई। अब मेरे पर्स में मेरे बेटे की तस्वीर थी। इसी तरह कई साल निकल गए। मेरे माता-पिता का देहांत हो गया। कुछ समय पहले मेरी पत्नी की भी मृत्यु हो गई। मेरा बेटा पढ़ने के लिए विदेश गया था, उसने वहीं नौकरी करी और शादी भी कर ली। अब वो वहीं बस गया है।

उस से अलग हुए इतने साल हो गए की मैं उसकी शक्ल भी भूलने लगा हूं। अब हालत यह है कि मुझे वाकई लगता है कि भगवान के अलावा हमारा सच में कोई नहीं है। अब मेरे पास ऐसा कोई नहीं जिसकी तस्वीर मैं पर्स में रख सकूं। अब सिर्फ मेरे इष्ट कृष्ण ही मेरे रह गए हैं।

यह कहानी सुनकर टीटी ने पर्स उस बूढ़े को वापस दे दिया और अगले स्टेशन पर टीटी उतर गया। अपने इष्ट देव का चित्र खरीदने के लिए। तो आपके पर्स में किसकी तस्वीर है?

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

रूद्राक्ष भ्रांतियां और पहचान भाग-2

रूद्राक्ष किसी फैक्टरी में तैयार नहीं किया जाता। यह एक फल है जो पेड़ पर उगता है। इसलिए रूद्राक्ष नकली नहीं हो सकता भले ही कच्चा हो। पांच मुखी रूद्राक्ष बहुतायत में उगते हैं इस कारण यह सस्ते मिलते हैं लेकिन रूद्राक्ष की कुछ किस्में कम मिलती हैं इसी कारण इनका मूल्य काफी अधिक होता है।

समस्या तब शुरू होती है जब नकली रूद्राक्ष बाजार में मिलने लगते। बड़े बड़े स्थानों पर इस तरह का कारोबार हो रहा है जिस पर रोक लगाने के लिए किसी भी तरह की व्यवस्था नहीं है। पारखी व्यक्ति तो इसकी पहचान कर लेता है लेकिन आम आदमी हजारों रूपये लगाकर भी नुकसान में ही रहता है। अब आपको बताते हैं की किस तरह नकली रूद्राक्ष बनाया जाता है और असली रूद्राक्ष की पहचान की जाती है।

1) प्रायः पानी में डूबने वाला रूद्राक्ष असली और जो पानी पर तैर जाए उसे नकली माना जाता है। लेकिन यह सच नहीं है। पका हुआ रूद्राक्ष पानी में डूब जाता है जबकी कच्चा रूद्राक्ष पानी पर तैर जाता है। इसलिए इस प्रक्रिया से रूद्राक्ष के पके या कच्चे होने का पता तो लग सकता है, असली या नकली होने का नहीं।

2) प्रायः गहरे रंग के रूद्राक्ष को अच्छा माना जाता है और हल्के रंग वाले को नहीं। असलियत में रूद्राक्ष का छिलका उतारने के बाद उसपर रंग चढ़ाया जाता है। बाजार में मिलने वाली रूद्राक्ष की मालाओं को पिरोने के बाद पीले रंग से रंगा जाता है। रंग कम होने से कभी-कभी हल्का रह जाता है। काले और गहरे भूरे रंग के दिखने वाले रूद्राक्ष प्रायः इस्तेमाल किए हुए होते हैं, ऐसा रूद्राक्ष के तेल या पसीने के
संपर्क में आने से होता है।

3) कुछ रूद्राक्षों में प्राकृतिक रूप से छेद होता है ऐसे रूद्राक्ष बहुत शुभ माने जाते हैं। जबकि ज्यादातर रूद्राक्षों में छेद करना पड़ता है।

4) दो अंगूठों या दो तांबे के सिक्कों के बीच घूमने वाला रूद्राक्ष असली है यह भी एक भ्रांति ही है। इस तरह रखी गई वस्तु किसी दिशा में तो घूमेगी ही। यह उस पर दिए जाने दबाव पर निर्भर करता है।

5) रूद्राक्ष की पहचान के लिए उसे सुई से कुरेदें। अगर रेशा निकले तो असली और न निकले तो नकली होगा।

6) नकली रूद्राक्ष के उपर उभरे पठार एकरूप हों तो वह नकली रूद्राक्ष है। असली रूद्राक्ष की उपरी सतह कभी भी एकरूप नहीं होगी। जिस तरह दो मनुष्यों के फिंगरप्रिंट एक जैसे नहीं होते उसी तरह दो रूद्राक्षों के उपरी पठार समान नहीं होते। हां नकली रूद्राक्षों में कितनों के ही उपरी पठार समान हो सकते हैं।

7) कुछ रूद्राक्षों पर शिवलिंग, त्रिशूल या सांप आदी बने होते हैं। यह प्राकृतिक रूप से नहीं बने होते बल्कि कुशल कारीगरी का नमूना होते हैं। रूद्राक्ष को पीसकर उसके बुरादे से यह आकृतियां बनाई जाती हैं। इनकी पहचान का तरीका आगे लिखूंगा।

8) कभी-कभी दो या तीन रूद्राक्ष प्राकृतिक रूप से जुड़े होते हैं। इन्हें गौरी शंकर या गौरी पाठ रूद्राक्ष कहते हैं। इनका मूल्य काफी अधिक होता है इस कारण इनके नकली होने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है। कुशल कारीगर दो या अधिक रूद्राक्षों को मसाले से चिपकाकर इन्हें बना देते हैं।

9) प्रायः पांच मुखी रूद्राक्ष के चार मुंहों को मसाला से बंद कर एक मुखी कह कर बेचा जाता है जिससे इनकी कीमत बहुत बढ़ जाती है। ध्यान से देखने पर मसाला भरा हुआ दिखायी दे जाता है।

10) कभी-कभी पांच मुखी रूद्राक्ष को कुशल कारीगर और धारियां बना अधिक मुख का बना देते हैं। जिससे इनका मूल्य बढ़ जाता है। प्राकृतिक तौर पर बनी धारियों या मुख के पास के पठार उभरे हुए होते हैं जबकी मानव निर्मित पठार सपाट होते हैं। ध्यान से देखने पर इस बात का पता चल जाता है।
इसी के साथ मानव निर्मित मुख एकदम सीधे होते हैं जबकि प्राकृतिक रूप से बने मुख पूरी तरह से सीधे नहीं होते।

11) प्रायः बेर की गुठली पर रंग चढ़ाकर उन्हें असली रूद्राक्ष कहकर बेच दिया जाता है। रूद्राक्ष की मालाओं में बेर की गुठली का ही उपयोग किया जाता है।

12) रूद्राक्ष की पहचान का तरीका- एक कटोरे में पानी उबालें। इस उबलते पानी में एक-दो मिनट के लिए रूद्राक्ष डाल दें। कटोरे को चूल्हे से उतारकर ढक दें। दो चार मिनट बाद ढक्कन हटा कर रूद्राक्ष निकालकर ध्यान से देखें। यदि रूद्राक्ष में जोड़ लगाया होगा तो वह फट जाएगा। दो रूद्राक्षों को चिपकाकर गौरीशंकर रूद्राक्ष बनाया होगा या शिवलिंग, सांप आदी चिपकाए होंगे तो वह अलग हो जाएंगे।

जिन रूद्राक्षों में सोल्यूशन भरकर उनके मुख बंद करे होंगे तो उनके मुंह खुल जाएंगे। यदि रूद्राक्ष प्राकृतिक तौर पर फटा होगा तो थोड़ा और फट जाएगा। बेर की गुठली होगी तो नर्म पड़ जाएगी, जबकि असली रूद्राक्ष में अधिक अंतर नहीं पड़ेगा।

यदि रूद्राक्ष पर से रंग उतारना हो तो उसे नमक मिले पानी में डालकर गर्म करें उसका रंग हल्का पड़ जाएगा। वैसे रंग करने से रूद्राक्ष को नुकसान नहीं होता है।

रूद्राक्षः शिव का वरदान भाग-1

रूद्राक्ष को शिव की आंख कहा जाता है। रूद्राक्ष पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक फल है। मुख्यतः यह पेड़ नेपाल, इंडोनेशिया और भारत में पाया जाता है। इस पेड़ पर छोटे व मजबूत फल लगते हैं जिनका आवरण उतारने पर अंदर से मजबूत गुठली वाला फल मिलता है जिसे रूद्राक्ष कहते हैं।

रूद्राक्ष का धार्मिक महत्व होने के साथ ही इसका प्रयोग आयुर्वेदिक दवाईयों में भी होता है। इसमें इतने चुंबकीय गुण होते हैं कि असली रूद्राक्ष की माला पहनने पर ब्लड प्रेशर और हृदय रोगों में भी लाभ होता है।

असली और पके हुए रूद्राक्ष में विद्युत शक्ति होती है तथा शरीर के साथ रगड़ खाने पर इसमें से निकलने वाली उर्जा मनुष्य को शारीरिक व मानसिक से लाभ देता है। यहां तक की चील जैसे विभिन्न पक्षी पके हुए रूद्राक्ष को अपने घोंसले में रखते हैं।

रूद्राक्ष के बीचों-बीच एक सिरे से दूसरे सिरे तक एक रेखा होती है जिसे मुख कहा जाता है। रूद्राक्ष में यह रेखाएं या मुख एक से 14 मुखी तक होते हैं और कभी-कभी 15 से 21 मुखी तक के रूद्राक्ष भी देखे गए हैं। आधी या टूटी हुई लाईन को मुख नहीं माना जाता है। जितनी लाईनें पूरी तरह स्पष्ट हों उतने ही मुख माने जाते हैं।

एक मुखी- सूर्य, दो मुखी-चंद्र, तीन मुखी-मंगल, चार मुखी-बुध, पांच मुखी-गुरू, छः मुखी-शुक्र, सात मुखी-शनि, आठ मुखी-राहू, नौ मुखी-केतू, 10मुखी-भगवान महावीर, 11मुखी-इंद्र, 12मुखी-भगवान विष्णु, 13मुखी- इंद्र, 14मुखी- शनि, गौरी शंकर और गणेश रूद्राक्ष पाए जाते हैं।

रविवार, 8 मार्च 2009

एक बरस बीत गया

अगर कल यानी 9 मार्च तक सब कुछ ठीक रहा तो मैं एक साल और बुढ़ा जाऊंगा। जन्मदिन की इस पूर्व संध्या पर ओशो की एक पुरानी मैग्जीन मिल गई। उस में कुछ काम का लगा इसलिए आप सब के साथ बांट रहां हूं। इस लेख में ओशो उम्र के सात साल के वर्तुल की बात कर रहें हैं।

यूं तो हस्तरेखा जानने वाले विशेषज्ञ सात साल के बारे में इसलिए भी जानते होंगे की हस्तरेखाविद् कीरो और उनके बाद और भी कई विद्वानों ने जीवन के अध्ययन के लिए रेखाओं को सात साल के हिस्सों में बांट कर अध्ययन के लिए कहा है। कुछ इसी तरह का विचार काटवे ने भी लिखा है। अब इस पर ओशो ने क्या कहा है आगे पढ़िए-

एक से सात साल - बच्चा बहुत मासूम होता है, बिल्कुल संत जैसा। वह अपनी जननेंद्रियों से खेलता है लेकिन उसे पता नहीं होता कि यह गलत है। वह नैसर्गिक ढंग से जीता है।

सात से चौदह साल- सात साल में बच्चा बचपन से बाहर आ जाता है। एक नया अध्याय खुलता है। अब तक वह निर्दोष था, अब दुनियादारी और दुनिया की चालाकी सीखने लगता है। झूठ बोलने लगता है, मुखौटे पहनने लगता है। झूठ की पहली पर्त उसे घेर लेती है।

चौदह से इक्कीस साल- चौदह साल से पहले सैक्स उसके लिए कभी समस्या न थी, लेकिन अब अचानक उसके अंतरतम में काम ऊर्जा पैदा हो जाती है। उसकी पूरी दुनिया ही बदल जाती है। पहली बार विपरीत लिंगी व्यक्ति में उत्सुक्ता जगती है। जीवन की एक अलग ही दृष्टि पैदा होती है।

इक्कीस से अट्ठाईस साल-अब उसकी सत्ता की दौड़ शुरू होती है। महत्वकांक्षा, धन कमाने की लालसा, नाम कमाने का प्रयास, यह सब इक्कीस वर्ष में शुरू हो जाता है। उसे अपने आपको सिद्ध करना है, जीवन में जड़ें जमानी हैं।

अट्ठाईस से पैंतीस साल- (सब ठीक रहा तो अगले साल में मैं इसे पार कर जाउंगा)-यहां आकर वह सुरक्षा के बारे में सोचने लगता है। सुविधाएं, बैंक बैलेंस॥ पूंजी सुरक्षित रखने की योजना बनाता है। अट्ठाईस साल तक उसकी गाड़ी खतरों से खेलती है, मुश्किलों का सामना करना पसंद करता है। सारे विद्रोही और हिप्पी तीस साल से पहले ही होते हैं। तीस साल में आते ही सारी खलबली शांत हो जाती है। सभी हिप्पी व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं।

पैंतीस से बयालिस साल- पैंतीस की आयु में एक बार फिर बदलाव की शुरूआत होती है। पैंतीस साल जीवन का शिखर है। अगर सत्तर साल का जीवन हो तो पैंतीस साल उसका मध्य बिंदु है। जीवन वर्तुल आधा समाप्त हो गया। अब व्यक्ति मृत्यु के बारे में सोचने लगता है, उसे भय पैदा हो जाता है। यही उम्र है जब अल्सर, टीबी, रक्तचाप, दिल का दौरा, कैंसर और अन्य संघातक रोग सिर उठाने लगते हैं। भय के कारण। भय इन सब को पैदा करता है। व्यक्ति हर प्रकार की दुर्घटनाओं का शिकार होने लगता है क्योंकि उसके मन में डर बैठ गया है। मृत्यु निकट आती जान पड़ती है। भय उसका पहला चरण लगता है।

बयालिस से उनचास साल- हर व्यक्ति को धर्म की जरूरत होती है। अब उसे धार्मिक संबंध की जरूरत होती है-ईश्वर या गुरू या कोई ऐसी जगह जहां वह समर्पण कर सके। जहां जाकर वह अपना बोझ हल्का कर सके। यदि धार्मिक व्यक्ति न मिला और लोग एडोल्फ हिटलर या स्टैलिन को खोज लेते हैं तो उन्हें भगवान बना लेते हैं। यदि वो भी न मिलें तो मनश्चिक्तिसक हैं। थेरोपिस्ट हैं।

उनचास से छप्पन साल- व्यक्ति धर्म में जड़ें जमा लता है। खोज समाप्त होती है, उसे राह मिल जाती है।

छप्पन से तरेसठ साल- अगर वह ध्यान में डूबता चला जा रहा है और सही दिशा में है तो उसे सतोरी की झलक मिल सकती है।

तरेसठ से सत्तर साल- मृत्यु को आलिंगन की तैयारी। यदि उसे सतोरी की झलक मिली है तो मृत्यु उसके लिए एक सुंदर अनुभव होगा। वह दिव्यता में प्रवेश का द्वार बनेगी।

यह ओशो ने कहा है। मुश्किल तब आती है जब पैंतीस से बयालिस साल में इच्छाओं के केंद्र बदलने शुरू हो जाते हैं। कई लोग इस हिस्से में शादी जैसी चीज करते हैं। कुछ के साथ अन्य घटनाएं घट जाती हैं। इस वर्तुल में गड़बड़ होते ही आगे आने वाले वर्तुलों से गड़बड़ों की सीरीज शुरू हो जाती है। 99 फीसदी लोगों का पैंतीस से बयालिस का वर्तुल वैसा नहीं होता जैसा होना चाहिए।

मेरे जन्मदिन पर आपकी न दी बधाई में स्वीकारता हूं। धन्यवाद

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

उपाय : असलियत या फसाना

किसी भी ज्योतिषी, हस्तरेखाविद्, अंकशास्त्री या और किसी तरह के सलाहकार के पास से वापस आने पर जातक या क्लायंट के हाथ में होता है इस पर्चा जिसमें उस सलाहकार द्वारा सुझाए कुछ उपाय लिखे होते हैं। क्या वाकई इन उपायों से कुछ होता है? या यह किसी चंडूखाने की गप्पबाजी है।

निश्चित ही इस बात को पढ़ने के बाद अगर आपके जीवन में कभी इस तरह के उपायों को करने के बाद फायदा हुआ होगा तो आप इसके पक्ष में होंगे और अगर उपायों को करने के बाद भी आपकी कोई आस पूरी नहीं हुई होगी तो आप इसका विरोध करेंगे। आप कहेंगे उपाय वगैरह कुछ नहीं होते यह सब लोगों को लूटने के शगल हैं। आपका विचार इन दोनों में से कुछ भी हो एक बात शर्तिया कह सकता हूं कि अगर अब भी आपकी किसी समस्या का निवारण करने के लिए कोई उपाय बताया जाए तो विरोध करने वाले भी उसे करने से नहीं चूकेंगे। यह आकर्षण है उपाय का।

उपाय क्या होते हैं। अगर आप सोचें की आप के मन की इच्छाऐं पूरी करने के लिए उपायों का प्रयोग किया जा सकता है तो सबसे पहले तो अपने दिमाग से इस ख्याल को बिल्कुल निकाल दीजिए। उपायों का उपयोग सिर्फ जो आपके भाग्य में है और मिल नहीं पा रहा, उसे आप तक पहुंचाने में ही हो सकता है।

मूल रूप से उपाय दो तरह के होते हैं। पहला, वो जो आपकी कुंडली के अच्छे ग्रहों को बलवान करते हैं। दूसरा, वो जो आपकी कुंडली में बुरा असर देने वाले ग्रहों को रोकते हैं। इसके निर्णय के लिए भविष्यवक्ता को कोशिशें काम करती हैं। यह उसका काम है कि पहले तो वह देखे की पूछा गया प्रश्न जातक के भाग्य में है भी या नहीं! अब आप के मन में यह ख्याल आएगा की मनुष्य तो स्वतंत्र है फिर ज्योतिषी उसकी कुंडली से उसके भाग्य का सीमा निर्धारण कैसे कर सकता है?

इसे समझाने के लिए मैं आपको दो बातें बताना चाहूंगा। पहली, एक व्यक्ति ने दूसरे से पूछा की कर्म और भाग्य में क्या अंतर है? तो पहले ने कहा एक पैर उठा। दूसरे ने झट से दायां पैर उठा लिया। पहले ने कहा कि अब दूसरा पैर उठा। तो दूसरा बोला वो अब नहीं उठ सकता। पहला बोला यह अंतर है कर्म और भाग्य में। पहला पैर जो आपने उठाया वो आपका कर्म था। यह पूरी तरह आपके हाथ में था कि आप कौन सा पैर उठाते हैं। लेकिन एक पैर उठाते ही दूसरा बंध गया यह भाग्य है। यानि भाग्य कर्म पर आधारित होता है। कई बार कुछ इस तरह की बातें हो जाती हैं कि हमारे पहले कभी उठाए गए पैर की वजह से इस जन्म में हमारा भाग्य बंध जाता है। इस बंधन को तोड़ने के लिए उपाय की जरूरत होती है।

दूसरी बात यह कि जिस व्यक्ति को अपने प्रयत्नों से कुछ मिलना है ऐसे लोग बहुत कम ही भाग्य बंचवाने जाते हैं। मनुष्य के अनगिनत तरह के विचारों में मुख्यतः चार प्रकार के लोग होते हैं। इनहें लोगों की प्रवृति भी कह सकते हैं। लोगों की इस प्रवृति को जानने के बाद ही जो ज्योतिषी उपचार बताता है। उसे ही यश की प्राप्ति होती है। मनुष्य के चार स्वभाव और उपायों के तरीकों पर फिर किसी पोस्ट में चर्चा करूंगा। नमस्कार।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

धार्मिक व मांगलिक चिन्हों का वैज्ञानिक अर्थ

वातावरण और जीवित चीजों के उर्जा क्षेत्र को नापने के उपकरणों की इजाद के साथ साथ इसको मापने की इकाई को नाम दिया गया बोविस। मृत मानव शरीर का बोविस शून्य माना गया है और मानव में औसत ऊर्जा क्षेत्र 6,500 बोविस पाया गया है।

अनेक धार्मिक स्थलों का ऊर्जा स्तर काफी उंचा मापा गया है जिसके चलते वहां जाने वालों को शांति और लाभ का आभास होता है और इस तरह धार्मिक स्थलों पर जाना जीवन की परिपाटी में ही शामिल हो गया। यही नहीं हमारे घरों में प्रयोग किए जाने वाले मांगलिरक चिन्हों में भी इसी तरह की ऊर्जा समाई है। जिसका लाभ हम जाने अनजाने में लेते रहते हैं।

जानिए की किस चिन्ह में कितनी ऊर्जा समाई है।

भारतीय स्वस्तिक - 1,00,0000 बोविस। यदि इसे उल्टा बना दिया जाए तो यह प्रतिकूल ऊर्जा को इसी अनुपात में बढ़ाता है।इसी स्वस्तिक को थोड़ा टेड़ा बना देने पर इसकी ऊर्जा मात्र 1,000 बोविस रह जाती है। ऊँ के ऊर्जा क्षेत्र में 70,000 बोविस की ऊर्जा होती है। वहीं चर्च के क्रास में 11,000 बोविस ऊर्जा होती है। चर्च में बजने वाली घंटियों में भी 11,000 बोविस की ऊर्जा होती है।

मस्जिद में औसतन 12,000 बोविस की ऊर्जा होती है। तिब्बत के मंदिरों में ऊर्जा का स्तर 14,000 बोविस रहता है। बुद्ध के स्तूप में 12,000 बोविस ऊर्जा मापी गई है। तिब्बत वासियों की पूजा के समय घुमाया जाने वाला चक्र 12,000 से 14,000 बोविस ऊर्जा का निर्माण करता है।

इजिप्ट में ‘आई’ सिंबल प्रतीक चिंह में 9,000 बोविस ऊर्जा बताई जाती है। रूस में पवित्र माने जाने वाले ‘की’ (चाबी) के चिंह में भी 9,000 बोविस ऊर्जा है। इसी तरह लाल रंग के फूलों में ऊर्जा की मात्रा 65,00 से 72,00 बोविस ऊर्जा है।

तो अब आप जान ही गए होंगे की घर में प्रयुक्त होने वाले मांगलिक चिंह केवल सजावट के लिए ही नहीं होते बल्कि इनके पीछे भारतीय ज्ञान की गंगा बहाते ऋषी-मुनियों का आर्शिवाद छुपा है। जिन्होंने प्राचीन काल में कड़ी मेहनत के बाद आज के मानव को सुखी जीवन के सूत्र बिना किसी लालच के सरलता से सुलभ करा दिए हैं। उन विद्वानों को सादर प्राणाम करें और उनके द्वारा आपके भले के लिए की गई उनकी रिसर्च का लाभ उठाऐं।

स्वस्तिक से करें वास्तुदोष दूर

पिछली पोस्ट में मांगलिक चिंहों में निहित ऊर्जा संबंधी जानकारी के बाद आप समझ ही गए होंगे की स्वास्तिक में अंर्तनिहित 1,00,0000 बोविस ऊर्जा का लाभ लेने के लिए ही हिंदू धर्म में स्वस्तिक को सर्वमान्य व सर्वप्रयोग्य बनाया गया है। अब बताते हैं कि किस तरह इस ऊर्जा की सहायता से किसी भी तरह के वास्तु दोष से छुटकारा पाया जा सकता है।

प्राचीन काल में जिन वास्तु नियमों का विद्वान कर गए हैं उनका महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। परन्तु कई कारणों से इन नियमों को पालन न करने की सूरत में घर में किसी न किसी तरह का वास्तु दोष आ ही जाता है। इन वास्तु दोषों के निवारण के उपाय किसी प्रशिक्षित वास्तु विशेषज्ञ से कराने चाहिए। लेकिन फौरी तौर पर एक स्वस्तिक प्रयोग बता रहें हैं जिससे वास्तु की समस्या का कुछ हद तक निवारण हो सकता है।

वास्तु दोष को दूर करने के लिए बनाया गया स्वस्तिक 6 इंच से कम नहीं होना चाहिए। घर के मुख्य़ द्वार के दोनों ओर जमीन से 4 से 5 फुट ऊपर सिंदूर से यह स्वस्तिक बनाऐं। घर में जहां भी वास्तु दोष है और उसे दूर करना संभव न हो तो वहां पर भी इस तरह का स्वस्तिक बना दें।

जिस भी दिशा की शांति करानी हो उस दिशा में 6"x6" का तांबे का स्वस्तिक यंत्र पूजन कर लगा देना चाहिए। इस यंत्र के साथ उस दिशा स्वामी का रत्न भी यंत्र के साथ लगा दें। नींव पूजन के समय भी इस तरह के यंत्र आठों दिशाओं व ब्रह्म स्थान पर दिशा स्वामियों के रत्न के साथ लगा कर गृहस्वामी के हाथ के बराबर गड्ढा खोद कर, चावल बिछा कर, दबा देना चाहिए। पृथ्वी में इन अभिमंत्रित रत्न जड़े स्वस्तिक यंत्र की स्थापना से इनका प्रभाव काफी बड़े क्षेत्र पर होने लगता है।

दिशा स्वामियों की स्थिति इस प्रकार है- ब्रह्म स्थान-माणिक, पूर्व-हीरा, आग्नेय-मूंगा, दक्षिण-नीलम, नैऋत्य-पुखराज, पश्चिम-पन्ना, वायव्य-गोमेद, उत्तर-मोती, इशान-स्फटिक।

जीवन पर रंगों का प्रभाव

हम हमेशा से देखते आए हैं कि देवी-देवताओं के चित्र में उनके मुख मंडल के पीछे एक आभामंडल बना होता है। यह आभा मंडल हर जीवित व्यक्ति, पेड़-पौधे आदी में निहित होता है। इस आभामंडल को किरलियन फोटोग्राफी से देखा भी जा सकता है। यह आभामंडल शरीर से 2" से 4" की दूरी पर दिखाई देता है। इससे पता चलता है कि हमारा शरीर रंगों से भरा है।

हमारे शरीर पर रंगों का प्रभाव बहुत ही सूक्ष्म प्रक्रिया से होता है सबसे उपयोगी सूर्य का प्रकाश है, इसके अतिरिक्त हमारा रंगों से भरा आहार, घर या कमरों के रंग, कपड़े के रंग आदी भी शरीर की उर्जा पर प्रभाव डालते हैं। रंगों की इसी माया पर इलाज की एक पद्धती 'रंग चिक्तिसा' आधारित है। मनोरोग संबंधी मामलों में भी इस चिक्तिसा पद्धती का अनुकूल प्रभाव देखा गया है।

सूर्य की किरणों से हमें सात रंग मिलते हैं। सूर्य से मिलने वाले सात रंग हैं- लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और जामुनी। इन्हीं सात रंगों के मिश्रण से लाखों रंग बनाए जा सकते हैं। विभिन्न रंगों के मिश्रण से दस लाख तक रंग बनाए जा सकते हैं लेकिन सूक्ष्मता से 378 रंग ही देखे जा सकते हैं।

हर रंग की एक तासीर होती है। गर्म और ठंडा। हरे, नीले, बैंगनी और इनसे मिलते-जुलते रंगों का प्रभाव वातावरण में ठंडक का एहसास कराता है। वहीं दूसरी ओर पीले, लाल व इनके मिश्रण से बने रंग वातावरण में गर्मी का आभास देते हैं। इन्हीं रंगों की सहायता से वस्तुस्थिति तथा प्रभावों को भ्रामक भी बनाया जा सकता है।

-यदि कमरे में रोशनी कम आती है तो अस तरह के कमरे में एेसे रंगों का प्रयोग करें जो आपको ठंडक दे जैसे हरा,नीला, स्लेटी आदी।

-यदि कमरे में रोशनी कम आती हो तो इस तरह के रंगों का प्रयोग करें जिससे अंधेरा और न बढ़ने पाये। यहां सफेद, गुलाबी, हल्का संतरी, हल्का पीला, हल्का बैंगनी रंगों का प्रयोग करें। यह रंग कमरे में चमक भी लाएंगे।

-छोटे कमरे को बड़ा दिखाने के लिए छत को सफेद रंग से रंग दें।

-जिन कमरों की चौ़ड़ाई कम हो उन्हें बड़ा दिखाने के लिए दीवारों पर अलग-अलग रंग करें। गहरे रंग छोटी दीवारों पर एवं हल्के रंग लंबी दीवारों पर करें।

-यदि छोटा डिब्बेनुमा कमरा है तो उसे बड़ा दिखाने के लिए तो उसकी तीन दीवारों पर एक रंग और चौथी दीवार पर अलग रंग करें।

-दीवारों पर प्राकृतिक रंग या वाटर बेस रंग करें। सिन्थेटिक पेन्ट जो दीवारों को बिल्कुल सील कर दें वह ठीक नहीं रहते।

रंगों का चुनाव बहुत से पहलुओं पर निर्भर करता है प्रकाश की उपलब्धता, अपनी पसंद, कमरों का साईज आदी। कभी-कभी सही रंग का चुनाव जीवन को एक महत्वपूर्ण घुमाव दे देता है और कई बार अपने लिए विपरीत रंगों के प्रयोग से हम अनजाने ही मुसीबतों को बुलावा दे देते हैं। तो अब जीवन में आगे बढ़ने की एक सही राह आपके सामने है। अपने लिए लाभप्रद रंग को चुनें और जीवन का पूरी तरह से आनंद लें।

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

मन के दोराहे पर केपी ज्योतिष से चुने राह

कई अलग-अलग यो़जनाओं में से कौन सी सही रहेगी जानने के लिए केपी ज्योतिष का सहारा लिया जा सकता है। जो भी योजनाएं हों उनमें प्रत्येक के लिए एक नं चुन लें। तत्काल समय चल रहे रूलिंग प्लेनेट्स देखें। उत्तर मिल जाएगा। इसके लिए चाहिए
1) के पी नं चार्ट
2) तत्कालिक ग्रह स्थिती जानने के लिए स्थानिय पंचांग

उदाहरणःएक व्यक्ति के पास चार तरह के कार्य़ की योजना है।1) दूध का कारोबार 2) दवाई का कारोबार 3) ट्रांसपोर्ट का कारोबार 4) कंप्यूटर का कारोबार । अब इनके लिए 1-249 के बीच नं निकालने पर आते हैं क्रमशः 161, 129, 67 और 170अब आंकड़े इस प्रकार हैं-

कारोबार केपी नंबर राशीस्वामी नक्षत्र स्वामी उपनक्षत्र स्वामी
1) दूध 161 मंगल बुध सूर्य
2) दवाई 129 शुक्र मंगल चंद्र
3) ट्रांसपोर्ट 67 चंद्र शनि बुध
4) कंप्यूटर 170 गुरू केतू चंद्र

अब मान लेते हैं कि तत्कालिक पंचाग में- लग्न-कर्क(चंद्र), चंद्र राशी-धनु(गुरू), चंद्र नक्षत्र-पूर्वाषाढ(शु्क्र), दिन-मंगलवार(मंगल) यह ग्रह स्थिती है। इसके मुताबिक दवाई के कारोबार में आयी ग्रह स्थिती पंचांग की ग्रह स्थिती से अधिक मेल खाती है। तो निश्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि इस जातक को दवाई का कारोबार करने में लाभ मिलेगा।

इस विधि का लाभ कारोबार में ही नहीं और भी कई स्थितियों में किया जा सकता है। जैसे मित्रता, पार्टनरशिप, विवाह आदि। इस विधि में प्रश्नों की संख्या का कोई बंधन नहीं। दो से अधिक प्रस्तावों के होने पर इसे प्रयोग किया जा सकता है।

प्रस्ताव अधिक होने पर उत्तरों की संभावना भी बढ़ जाती है, ऐसे में चुनिंदा उत्तरों की केपी विधि से कुंडली बनाकर जवाब पाया जा सकता है। नहीं तो इसी विधि की बारंबार सहायता से किसी निर्णय पर पहुंचा जा सकता है। तीसरा और सर्वमान्य तरीके में जातक अपने रूझान और अनुभव से कारोबार करना भी हो सकता है।

शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

पुस्तक समीक्षा : भृगु नन्दी नाड़ी

नाड़ी ज्योतिष को ज्योतिष विद्या में रहस्मयी माना जाता है। इस विधि में जातक के हाथ के अंगूठे की छाप ले कर उस की सहायता से जातक के भूत, भविष्य व वर्तमान के बारे में बताया जाता है। कुछ मामलों में तो जातक का नाम और उसके माता-पिता का नाम, पत्नी का नाम और कई बातें बिल्कुल सटीक बता दिए गए हैं। नाड़ी ज्योतिष के इसी रहस्मय पक्ष पर कुछ प्रकाश डालने का काम करती है। ज्योर्तिविद आरजी राव की रंजन पब्लिकेशन से प्रकाशित पुस्तक भृगु नन्दी नाड़ी।

किताब की शुरूआत में ही लेखक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उन्होंने दो नाड़ी ग्रंथों नन्दी नाड़ी और भृगु नाड़ी में से कुछ भाग ले कर इस किताब की रचना की है। इस किताब में 500 से अधिक कुंडलियां हैं। कुछ कुंडलियों में केवल भविष्य कथन है और कुछ में भविष्य कथन के कारणों या विधि को भी स्पष्ट किया गया है।

इस किताब में प्रयुक्त नाड़ी ग्रंथों में कुंडलियों के लग्न का उल्लेख नहीं है। कई कुंडलियों में तो चंद्र यहां तक की बुध का भी प्रयोग नहीं किया गया है। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि कुंडलियों के साथ दिया गया विश्लेषण एक मोटे तौर पर दिया गया है। और कम शब्दों में कुंडली की व्याख्या के लिए शीघ्रगति की जगह शनि, गुरू जैसे मंदगति ग्रहों को प्राथमिकता दी गई है।

यह किताब वास्तव में कारक ग्रहों के गोचर की सहायता से भविष्यकथन का तरीका बताती है। इसमें कार्य से संबंधित ग्रह को लेकर उससे दूसरे, सातवें और बारहवें भावों का अध्ययन किया गया है। इसके साथ ही ग्रह किस राशी में बैठा है, उस राशी का स्वामी, उस राशी में बैठे अन्य ग्रहों आदी का प्रभाव भी देखा गया है।

इस ग्रंथ का प्रयोग कैसे किया जाए :जब मैं इस किताब को लेकर आया तो शुरूआत करते ही मेरा मन उब गया। इसमें कोई सूत्र नहीं दिए गए हैं। सिर्फ कुछ कुंडलियां और उनका भविष्यकथन, बस। कुछ समय बाद मैंने इस किताब को फिर पढ़ना शुरू किया। इसके बाद इसमें से कुछ सूत्र निकाले हैं। लिख रहा हूं। आप सब भी लगा कर देखिए और बतायें की कितने सटीक बैठे।

गुरू को बच्चों संबंधित कथन, बुध को विद्या संबंधी, शनि को कर्म संबंधी, शुक्र को विवाह संबंधी कारक माना गया है यह तो प्रस्तावना में लेखक ने लिख दिया है। अब कुछ नई बातें बताता हूं।

नाड़ी ज्योतिष गोचर में गुरू का शुक्र पर से गुजरना विवाह और मृत्यु जैसी घटनाऐं लाता है। पत्नी, बहन और भौतिक सुखों का कारक शुक्र को माना है। बड़ा भाई मंगल से, और छोटा भाई बुध से देखने को कहा है। यही नहीं बुध से फाईनेंस को भी देखा गया है।

गुरू के केतू पर तीसरे दफा के गोचर के बाद जातक के जीवन में स्थायित्व आता है। यानी 36 साल की आयु के बाद। गुरू केतू से चौथे भाव में हो तो इस तीसरी बार के गोचर में जातक को ख्याती मिलती है। जब तक शनि मंगल पर से गोचर नहीं कर जाता जातक के जीवन में आराम नहीं आता।

विवाह का समय मंगल के शुक्र पर से गोचर से पता चलता है। अगर मंगल और शुक्र राहू-केतू अक्ष के दोनों ओर हों तो वैवाहिक जीवन में परेशानियां आती हैं। शनि-शुक्र का सम सप्तक होना भी यही प्रभाव पैदा करता है।

शनि व शुक्र के दूसरे में उच्च का बुध हो तो यह अति धनाड्य होने का योग बनाता है।

आपने मेरी बात को इतना समय दिया इसके लिए धन्यवाद।

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

ज्योतिष क्या है

ज्योतिष को समझने से पहले हमें जीवन को समझना होगा। और जीवन का कोई फार्मूला नहीं है। जिन वजहों से कोई आगे बढ़ता है वही वजहें किसी को पीछे खींच लेती हैं।
इसी तरह ज्योतिष का भी कोई फार्मूला नहीं है। बेसिक्स हैं, जो कोई भी सीख सकता है। लेकिन फलित के लिए सूत्रों के अलावा कुछ और भी होना चाहिए ये बात सच है। अब ये कुछ और क्या है, इसमें कई बातें निकलती हैं। जिनका लब्बो लुआब यह है कि उपर वाले की दया होनी चाहिए।
ज्योतिषी का एक मूल धर्म जो मैं मानता हूं वो है आत्मनो मोक्षार्थ जगत हिताय च।अर्थात जगत का लाभ हो और हमें मोक्ष मिले। अब ये मोक्ष क्या है इसकी चर्चा कभी और करेंगे।
मेरी बात को समय देने के लिए धन्यवाद।