रविवार, 8 मार्च 2009

एक बरस बीत गया

अगर कल यानी 9 मार्च तक सब कुछ ठीक रहा तो मैं एक साल और बुढ़ा जाऊंगा। जन्मदिन की इस पूर्व संध्या पर ओशो की एक पुरानी मैग्जीन मिल गई। उस में कुछ काम का लगा इसलिए आप सब के साथ बांट रहां हूं। इस लेख में ओशो उम्र के सात साल के वर्तुल की बात कर रहें हैं।

यूं तो हस्तरेखा जानने वाले विशेषज्ञ सात साल के बारे में इसलिए भी जानते होंगे की हस्तरेखाविद् कीरो और उनके बाद और भी कई विद्वानों ने जीवन के अध्ययन के लिए रेखाओं को सात साल के हिस्सों में बांट कर अध्ययन के लिए कहा है। कुछ इसी तरह का विचार काटवे ने भी लिखा है। अब इस पर ओशो ने क्या कहा है आगे पढ़िए-

एक से सात साल - बच्चा बहुत मासूम होता है, बिल्कुल संत जैसा। वह अपनी जननेंद्रियों से खेलता है लेकिन उसे पता नहीं होता कि यह गलत है। वह नैसर्गिक ढंग से जीता है।

सात से चौदह साल- सात साल में बच्चा बचपन से बाहर आ जाता है। एक नया अध्याय खुलता है। अब तक वह निर्दोष था, अब दुनियादारी और दुनिया की चालाकी सीखने लगता है। झूठ बोलने लगता है, मुखौटे पहनने लगता है। झूठ की पहली पर्त उसे घेर लेती है।

चौदह से इक्कीस साल- चौदह साल से पहले सैक्स उसके लिए कभी समस्या न थी, लेकिन अब अचानक उसके अंतरतम में काम ऊर्जा पैदा हो जाती है। उसकी पूरी दुनिया ही बदल जाती है। पहली बार विपरीत लिंगी व्यक्ति में उत्सुक्ता जगती है। जीवन की एक अलग ही दृष्टि पैदा होती है।

इक्कीस से अट्ठाईस साल-अब उसकी सत्ता की दौड़ शुरू होती है। महत्वकांक्षा, धन कमाने की लालसा, नाम कमाने का प्रयास, यह सब इक्कीस वर्ष में शुरू हो जाता है। उसे अपने आपको सिद्ध करना है, जीवन में जड़ें जमानी हैं।

अट्ठाईस से पैंतीस साल- (सब ठीक रहा तो अगले साल में मैं इसे पार कर जाउंगा)-यहां आकर वह सुरक्षा के बारे में सोचने लगता है। सुविधाएं, बैंक बैलेंस॥ पूंजी सुरक्षित रखने की योजना बनाता है। अट्ठाईस साल तक उसकी गाड़ी खतरों से खेलती है, मुश्किलों का सामना करना पसंद करता है। सारे विद्रोही और हिप्पी तीस साल से पहले ही होते हैं। तीस साल में आते ही सारी खलबली शांत हो जाती है। सभी हिप्पी व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं।

पैंतीस से बयालिस साल- पैंतीस की आयु में एक बार फिर बदलाव की शुरूआत होती है। पैंतीस साल जीवन का शिखर है। अगर सत्तर साल का जीवन हो तो पैंतीस साल उसका मध्य बिंदु है। जीवन वर्तुल आधा समाप्त हो गया। अब व्यक्ति मृत्यु के बारे में सोचने लगता है, उसे भय पैदा हो जाता है। यही उम्र है जब अल्सर, टीबी, रक्तचाप, दिल का दौरा, कैंसर और अन्य संघातक रोग सिर उठाने लगते हैं। भय के कारण। भय इन सब को पैदा करता है। व्यक्ति हर प्रकार की दुर्घटनाओं का शिकार होने लगता है क्योंकि उसके मन में डर बैठ गया है। मृत्यु निकट आती जान पड़ती है। भय उसका पहला चरण लगता है।

बयालिस से उनचास साल- हर व्यक्ति को धर्म की जरूरत होती है। अब उसे धार्मिक संबंध की जरूरत होती है-ईश्वर या गुरू या कोई ऐसी जगह जहां वह समर्पण कर सके। जहां जाकर वह अपना बोझ हल्का कर सके। यदि धार्मिक व्यक्ति न मिला और लोग एडोल्फ हिटलर या स्टैलिन को खोज लेते हैं तो उन्हें भगवान बना लेते हैं। यदि वो भी न मिलें तो मनश्चिक्तिसक हैं। थेरोपिस्ट हैं।

उनचास से छप्पन साल- व्यक्ति धर्म में जड़ें जमा लता है। खोज समाप्त होती है, उसे राह मिल जाती है।

छप्पन से तरेसठ साल- अगर वह ध्यान में डूबता चला जा रहा है और सही दिशा में है तो उसे सतोरी की झलक मिल सकती है।

तरेसठ से सत्तर साल- मृत्यु को आलिंगन की तैयारी। यदि उसे सतोरी की झलक मिली है तो मृत्यु उसके लिए एक सुंदर अनुभव होगा। वह दिव्यता में प्रवेश का द्वार बनेगी।

यह ओशो ने कहा है। मुश्किल तब आती है जब पैंतीस से बयालिस साल में इच्छाओं के केंद्र बदलने शुरू हो जाते हैं। कई लोग इस हिस्से में शादी जैसी चीज करते हैं। कुछ के साथ अन्य घटनाएं घट जाती हैं। इस वर्तुल में गड़बड़ होते ही आगे आने वाले वर्तुलों से गड़बड़ों की सीरीज शुरू हो जाती है। 99 फीसदी लोगों का पैंतीस से बयालिस का वर्तुल वैसा नहीं होता जैसा होना चाहिए।

मेरे जन्मदिन पर आपकी न दी बधाई में स्वीकारता हूं। धन्यवाद

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